एक तंग और धूल भरी गली के कोने में एक छोटी सी साइकिल मरम्मत की दुकान थी। वहाँ 19 साल का राघव अपने छोटे भाई गोलू के साथ रहता था। दो साल पहले एक सड़क हादसे में उनके माता-पिता चल बसे थे। राघव के कंधों पर अचानक से पूरे घर की जिम्मेदारी और गोलू की पढ़ाई का बोझ आ गिरा था।
राघव सुबह 6 बजे उठता, दिन भर ग्रीस और काले तेल में हाथ साने साइकिलों के पंचर बनाता, और रात को दुकान के शटर के नीचे ही दोनों भाई चटाई बिछाकर सो जाते। कमाई इतनी ही होती कि दो वक्त की रूखी-सूखी रोटी जुट पाती।
मुसीबत तब टूटी जब कड़ाके की ठंड वाले एक दिन गोलू को तेज बुखार आया। राघव उसे सरकारी अस्पताल ले गया, तो पता चला कि गोलू को फेफड़ों में गंभीर संक्रमण है और उसे तुरंत निजी अस्पताल में वेंटिलेटर और महंगी दवाइयों की जरूरत है। डॉक्टर ने साफ कह दिया—"अगले 48 घंटों में 80 हजार रुपये का इंतजाम नहीं हुआ, तो बच्चे को बचाना मुश्किल हो जाएगा।"
80 हजार रुपये राघव के लिए किसी पहाड़ से भी बड़े थे।
वह पागलों की तरह बारिश और ठंड में रास्ते पर भागने लगा। उसने अपने गाँव के रिश्तेदार, दुकान के मालिक, और पहचान के हर शख्स के आगे हाथ जोड़े, पैर पकड़े। लेकिन गरीबी में कोई साथ नहीं देता—किसी ने दरवाजा बंद कर दिया तो किसी ने दो-सौ रुपये हाथ में थमाकर टाल दिया।
रात के 12 बज चुके थे। अस्पताल की घड़ी की सुइयाँ टिक-टिक कर आगे बढ़ रही थीं। राघव अस्पताल के ठंडे फर्श पर बैठकर फूट-फूटकर रोने लगा। उसके मन में एक पल के लिए गलत रास्ते पर जाने का ख्याल भी आया कि किसी का बैग छीन ले या चोरी कर ले, लेकिन माँ की दी हुई सीख याद आ गई।
तभी उसकी नजर अस्पताल के बाहर एक पुराने नीम के पेड़ के नीचे लगे होर्डिंग पर पड़ी—"आपातकालीन रक्तदान और प्लेटलेट्स शिविर"।
राघव भागकर अंदर गया। उसने डॉक्टर से कहा, "साब, मेरा खून ले लो, मेरी दोनों किडनियाँ ले लो, बस मेरे भाई को बचा लो!" डॉक्टर ने उसे समझाया कि अंग ऐसे नहीं बेचे जाते, लेकिन राघव की हालत देखकर वहाँ मौजूद एक समाज सेवी (NGO) कार्यकर्ता का दिल पिघल गया। उसने राघव का समर्पण और उसकी आँखों का दर्द देखा।
उस कार्यकर्ता ने तुरंत अस्पताल के बिल की गारंटी ली और अपने नेटवर्क से गोलू के लिए दवाइयों का इंतजाम करवाया। राघव ने भी पूरी रात जागकर अस्पताल के ब्लड बैंक में 2 बार रक्तदान किया और मरीजों के स्ट्रैचर खींचने में मदद की ताकि अस्पताल का कुछ खर्च कम हो सके।
अगली सुबह जब सूरज की पहली किरण निकली, तो डॉक्टर बाहर आए और बोले—"तुम्हारा भाई अब खतरे से बाहर है।"
राघव भागकर आईसीयू के दरवाजे के शीशे के पास गया। गोलू ने धीमी सी आँखें खोलीं और मुस्कुराया। राघव के पास जेब में एक रुपया भी नहीं बचा था, हाथ काले तेल और खून के निशानों से सने थे, लेकिन उसकी आँखों में आँसुओं के साथ एक अजीब सा सुकून था। उसने उस दिन समझ लिया था कि मुसीबत कितनी भी बड़ी क्यों न हो, अगर इंसान अपने जमीर को टूटने न दे, तो अंधेरे के बाद उजाला जरूर आता है।Writer has not written anything about themselves.