अमन की नई साइकिल
अमन सातवीं कक्षा में पढ़ता था। वह बहुत ही सीधा, शांत और पढ़ाई में होनहार लड़का था। काफी समय से उसकी एक ही जिद थी—एक नई साइकिल। उसके सारे दोस्त शाम को अपनी-अपनी साइकिलों पर घूमते, रेस लगाते, लेकिन अमन के पास साइकिल नहीं थी। वह चुपचाप उन्हें देखता रहता।
एक दिन, अमन के पिताजी ने उसे पास बुलाया और प्यार से सिर पर हाथ रखते हुए कहा, "अमन, अगर तुम इस बार छमाही परीक्षा में कक्षा में प्रथम आओगे, तो मैं तुम्हें तुम्हारी मनपसंद साइकिल दिलाऊंगा।"
पिताजी की बात सुनकर अमन की आँखों में चमक आ गई। उसने उसी दिन से दिन-रात एक कर दिया। वह सुबह जल्दी उठता, स्कूल से आने के बाद मन लगाकर पढ़ता और दोस्तों के साथ खेलने भी नहीं जाता। उसकी इस लगन को देखकर उसके माता-पिता बहुत खुश थे।
आखिरकार परीक्षा का दिन आया। अमन ने सारे पेपर बहुत अच्छे से दिए। जब परिणाम घोषित हुआ, तो अमन ने अपनी कक्षा में पहला स्थान हासिल किया था! उसके शिक्षक ने भी उसकी खूब तारीफ की।
अमन दौड़ता हुआ घर आया और अपनी रिपोर्ट कार्ड पिताजी को दिखाई। पिताजी का सीना गर्व से चौड़ा हो गया। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, "चलो अमन, आज तुम्हारी मेहनत का फल पाने का समय आ गया है।"
दुकान का सफर
पिताजी अमन को साइकिल की एक बड़ी दुकान पर ले गए। वहाँ लाल, नीली, पीली, हर रंग की और गियर वाली साइकिलें खड़ी थीं। अमन की आँखें तो जैसे खुली की खुली रह गईं।
उसने एक शानदार नीले रंग की स्पोर्ट्स साइकिल चुनी, जिसमें चमचमाता हुआ बेल और आगे एक छोटी सी लाइट लगी थी।
पिताजी ने तुरंत उसके लिए पैसे चुकाए और साइकिल अमन के हवाले कर दी।
अमन की खुशी का ठिकाना नहीं था। वह अपनी नई साइकिल को छूकर देख रहा था, मानो उसका कोई सपना सच हो गया हो।
एक जरूरी सीख
घर लौटकर अमन ने सबसे पहले अपनी माँ को साइकिल दिखाई। माँ ने उसकी नजर उतारी और मिठाई खिलाई। शाम को अमन अपनी नई साइकिल लेकर कॉलोनी के पार्क में गया। उसके सारे दोस्त उसकी नई साइकिल देखकर हैरान रह गए और सबने उसे बधाई दी।
अमन ने उस दिन समझा कि कड़ी मेहनत और सब्र का फल हमेशा मीठा होता है। उसने अपने पिताजी से वादा किया कि वह अपनी साइकिल का हमेशा ध्यान रखेगा और आगे भी ऐसे ही मन लगाकर पढ़ाई करेगा।